चलेगी अब तिरी तानाशाही नहीं।
जम्हूरियत यानि लोकतंत्र है अब,
नवाबी, बादशाही, शंहशाही नहीं।
अकड़ तो है पहचान मुर्दे की यार,
क्या हुई तिरी इस से तबाही नहीं?
अपने लिए जब हमेशा सोचेगा तू,
तो हमें भी मरजी की मनाही नहीं।
मेरे दिल के पन्ने पर लिख दे गद्दार,
बनी है अब तलक वह स्याही नहीं !!
__मनोज मैहता
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