Thursday, 30 July 2020

करते हैं हम झूठी वाहवाही नहीं, चलेगी अब तिरी तानाशाही नहीं।जम्हूरियत यानि लोकतंत्र है अब, नवाबी, बादशाही, शंहशाही नहीं।अकड़ तो है पहचान मुर्दे की यार, क्या हुई तिरी इस से तबाही नहीं? अपने लिए जब हमेशा सोचेगा तू, तो हमें भी मरजी की मनाही नहीं।मेरे दिल के पन्ने पर लिख दे गद्दार, बनी है अब तलक वह स्याही नहीं !! __मनोज मैहता

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भेड़िए मर्द का देखना ...

भेड़िए  मर्द  का   कुछ भी  न  कर  पाएँगे, आँख  के  तेज़  से ही  देखना  मर  जाएँगे। रग-रग में जिसके  बहता हो  सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...