ग़मों में डूब जाने का न ऐ दिल कोई बहाना कर
तामीर हसरतों की ख़ातिर नया ही ठिकाना कर
बंदूक पास है माना तेरे महज़ इस से नहीं होगा
जंग जीतनी है ग़र तूने तब तय तो निशाना कर
कुदरती करिश्में से अब है नहीं ये बदलने वाला
अपनें शेरों की मस्ती से मौसम आशिक़ाना कर
यहाँ मुर्दानगी मरघट से भी छाई हैं क्यों ज़्यादा
अपनीं दास्ताँ कहकर ये महफ़िल शायराना कर
तानाकशी रोज की तुम्हें ही मार दे उससे पहले
ऊँची आवाज़ से तेरी वार तू भी क़ातिलाना कर
इरादे बुलंद हैं जो तेरे फिर किस बात का डर रे
मज़बूत हस्ती से अपनी कायल तो ज़माना कर
अम्र तेरी सालों से नहीं बल्कि दीदों से तय होगी
सदियों तक न जो भूले ऐसा करतब स्याना कर
बहक रहें हैं रिंद 'मनोज' मयख़ाना दैर दिखता है
तोड़ेंगे जाम बुत समझके बंद पीना पिलाना कर
.. मनोज मैहता
Good lines
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