Friday, 24 July 2015

barsaat-rainy season

काल़े बद्दल़ छाये अम्बरे, गड़गड़ गड़गड़ दितियो पाई
खड्डाँ नाल़ूआँ चढ़या पाणीं, रेत ता बजरी रूड़दी आई

टटमोराँ लईया कोखी पुट्टी,  हत्थे इक भतमोरी आई
मूसणें आल़े दा ढिड फूक्या, अम्माँ घ़रयो कुढ़दी आई

मच मच्चाँ की ह़ौडाँ ह़ोड्डे, थल़्ल़िया च पाणीं गोड्डे गोड्डे
झ़ुम्ब जल़या एह़ भोक्याँ आला, पूरी ह़ी मैं चुड़दी आई

हुक्के लई बैठ्ठया जबरा, गारूए पाई नें दित्तया भ़खाई
भ्याका मँज्जे तोड़ी जादा, मैं छल्लियाँ भ़ी गुडदी आई

बरसाती दी रात एह़ नेह़री, ह़ोया दूर गड़ाका कुत्थकी
चमकी जे रती कि बिजली, निंदर सदा ह़ी उड़दी आई

लगी जे पया दुआ़ बरसाल़ा, सोह़रे नें नूँह़ खुड़दी आई
जिह़ियाँ पाणिएँ लग्गी लग्गी, कुरसे दी नीँ पुड़दी आई

ताँ तूँ ते अक्खराँ जोड़ी, लिक्खदा रेह़ा मैं तोड़ी मरोड़ी
तुसाँ जो सायद नीं गम्मीं, मेरी गज़ल ता जुड़दी आई ।।
------------------------- मनोज मैहता ----------------------

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