Monday, 20 July 2015

Cobras have turned poison less...

खड़पे ह़ोए दन्दाँ बाझ़ी , सँगल़ाटाँ ते बचणां पौणाँ
गीत लखोये ह़ुण बेढ़़ँगे खबराँ पर ह़ी नचणाँ पौणाँ

सैह़ जमानें ह़ोई बीते जाह़लु सब किछ था सुझ़दा
ह़ाँखीं गिंयाँ छड्डी साथे, खीसे चस्मा रखणां पौणाँ

जिद नीं करनी पुट्ठे टैमें, छड्ड मड़या तू बेह़ले बैहमे
बाँदर रैह़ सैह़रें आई, तिज्जो बणें च बसणां पौणाँ

मतियां सुणीं बैट्ठा बुड़काँ, रेड्डे नीं मैं तिस्दे फुड़काँ
काह़लु तक सुंणगा ठूसाँ, घरे जो ह़ी न्ह़सणां पौणाँ

कोई नीं तिज्जो ते डरदा, तू कजो ठँडे साह़े भरदा?
सध़रो मेया ठाणेदारा, तिज्जो रौब भी दसणाँ पौणाँ

तिज्जो ह़ै इज्जत प्यारी, मान मेरा भी रखणां पौणाँ
मैह़ते ते जे गप्प कढ़ाणीं, घुट्ट इक ता चखणां पौणाँ

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