झुकता भी नहीं हूँ तो कटता भी नहीं हूँ,
तुफ़ाँ हूँ इक अजब सा,थमता भी नहीं हूँ |
नहीं हूँ मैं पानीं जो बर्फ बन जाऊँ पल में,
हूँ घूँट मस्त मदिरा का, जमता ही नहीं हूँ |
बुत नहीं हूँ मोम का जो चुप ही खड़ा रहे,
बेबात कोई हरकत पर करता भी नहीं हूँ |
हदें अपनी मेरे घर तक, ओ खींचनें वाले!
मत सोच कि मैं हदों से, बढ़ता ही नहीं हूँ |
तेरी उम्र व हालात का, लिहाज़ करता हूँ ,
तू भी जानता है वैसे, मैं डरता ही नहीं हूँ ||
--- --- --- --- --- मनोज मैहता
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