मुहब्बत सच्ची तो थी मेरी पर आँसू बहाना नहीं आया ,
मुझको रूठना नहीं आया और उसे मनाना नहीं आया |
सज़दा कर भी लेता मैं, उसके पैरों पे रखकर माथे को ,
मेरे लचीले तन और मन को, उसे झुकाना नहीं आया |
इश्क आँखों और रूहों की, रज़ामँदी से ही पनपता है ,
रूह तड़पती रही पर उसको आँखें मिलाना नहीं आया |
मुहब्बत की यह पतंगबाजी, नाकाम होना तो तय थी ,
उसे काटना तो आता था, मुझको उड़ाना नहीं आया |
हाथ थामनें की हसरत बस दबकर रह गई दिल ही में ,
मुझको पकड़ना नहीं आया तो उसे बढ़ाना नहीं आया |
------------------------ मनोज मैहता ----------------------
No comments:
Post a Comment