Sunday, 3 April 2016

She didn't know to look into my eyes!!

मुहब्बत सच्ची तो थी मेरी पर आँसू बहाना नहीं आया ,
मुझको रूठना नहीं आया और उसे मनाना नहीं आया |

सज़दा कर भी लेता मैं, उसके पैरों पे रखकर माथे को ,
मेरे लचीले तन और मन को,  उसे झुकाना नहीं आया |

इश्क आँखों और रूहों की,  रज़ामँदी से ही पनपता है ,
रूह तड़पती रही पर उसको आँखें मिलाना नहीं आया |

मुहब्बत की यह पतंगबाजी,  नाकाम होना तो तय थी ,
उसे काटना तो आता था,  मुझको  उड़ाना नहीं आया |

हाथ थामनें की हसरत बस दबकर रह गई दिल ही में ,
मुझको पकड़ना नहीं आया तो उसे बढ़ाना नहीं आया |
------------------------ मनोज मैहता ----------------------

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