माना कि मेहराबें -मीनार, इमारत की शान होते हैं ,
पर इसका सारा बोझ तो नींव के पत्थर ही ढोते हैं |
जिनकी वज़ह से महफिलों में खिलती हैं मुस्कानें ,
वोही शख्स अकेले में अक्सर फूट फूट के रोते हैं |
चर्चे बड़े ही होते हैं मजबूती की जिन दरख़्तान के,
सारी ताकत के अँश तो उनकी जड़ों ही में होते हैं |
दस्तूर पर दुनिया का यही, सबसे अज़ब है दोस्तो ,
भरे पेट आराम से हैं और भूखे फसल को बोते हैं |
छोड़िये इन शायरों की, वाहवाही करना बार बार ,
फ़ालतू- कम्बख्त लोग ये, खुली आँखों से सोते हैं ||
---- ---- ---- ----- ---- -- मनोज मैहता
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