छोटी सी बात का इतना बड़ा बवंडर बना दिया ,
आलीशान से मकाँ को, क्यों खँडहर बना दिया ?
कहावतें और मुहावरे, पन्नों में लिखे ही रह गये ,
मेरी इक ही हार नें, बैरी को सिकंदर बना दिया |
सीना मेरा छलनी हुआ उसके देखते ही कुछ यूँ ,
ग़ोया रब्ब नें उसकी नज़र को खंजर बना दिया |
जानें कहाँ से आ गया यह सैलाब या ज़लज़ला ,
ग़म-ऐ दिल नें आँखों को मेरी समंदर बना दिया |
तेरी ज़ुल्फ, तेरी नज़र, तेरे रुख़सार नें मिलकर ,
मेरी ज़िंदगी को इक भयानक, भंवर बना दिया |
---- ---- ---- ---- ---- ---- ---- मनोज मैहता
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