बड्डी भ़ारी बह़स थी छिड़ियो
इसा गप्पा पर पिछलिया सँझ़्झा
म्हाचले दा मुख्यमन्त्री बणंना
इस बरिया भ़ी कोह़की गँजा
दिंदे रैंह़ सैह़ बड़ियाँ दलीलाँ
बेह़लियाँ पाई छड्डियाँ लीलाँ
इबकिया इत्थु भी औंणीं 'आप '
खिड़णां फुल्ल न सुझ़णां पँज्जा
भेड़िए मर्द का कुछ भी न कर पाएँगे, आँख के तेज़ से ही देखना मर जाएँगे। रग-रग में जिसके बहता हो सत्य का लहू, उसके दुश्मन देखना ...
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